लखनऊ | उत्तर प्रदेश की राजनीति और कृषि क्षेत्र में एक बार फिर उबाल है। समाजवादी पार्टी (SP) ने सोमवार को गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि प्रदेश में आलू की खेती एक गहरे ‘ढांचागत संकट’ (Structural Crisis) में फंस गई है। पार्टी के अनुसार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आलू उत्पादन अब एक लाभदायक नकदी फसल होने के बजाय बार-बार उभरने वाले ‘ग्रामीण संकट’ का मुख्य कारण बनता जा रहा है।
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राम प्रताप सिंह ने आलू की खेती के बिगड़ते आर्थिक ढांचे पर चिंता जताई। उन्होंने बताया कि पश्चिमी यू.पी. और विशेषकर कन्नौज बेल्ट में आलू उत्पादन की जमीनी हकीकत डराने वाली है। वर्तमान में आलू की उत्पादन लागत ₹1,000 प्रति क्विंटल (यानी ₹500 प्रति 50 किलो) से अधिक हो गई है, जबकि इसके उलट मंडियों में कीमतें लगभग ₹800 प्रति क्विंटल पर सिमट गई हैं।
इसका सीधा अर्थ यह है कि किसान को फसल मंडी तक पहुँचाने और मार्केटिंग के खर्चों से पहले ही ₹200 प्रति क्विंटल का सकल नुकसान उठाना पड़ रहा है। यदि इसमें कोल्ड-स्टोरेज का शुल्क (जो ₹340 से ₹380 प्रति क्विंटल के बीच है) जोड़ दिया जाए, तो किसान की कुल लागत बढ़कर ₹1,340 से ₹1,380 प्रति क्विंटल तक पहुँच जाती है, जो मौजूदा बाजार भाव से कहीं ज्यादा है। फिरोज़ाबाद और आगरा बेल्ट में भी किराए के भंडारण पर निर्भर किसानों की स्थिति ऐसी ही दयनीय बनी हुई है।
खाद की किल्लत और बढ़ती इनपुट लागत
सपा ने उर्वरकों की उपलब्धता और बढ़ती कीमतों को भी इस संकट की बड़ी वजह बताया है। पार्टी का आरोप है कि यूरिया का सरकारी रेट (MRP) ₹242 प्रति 45 किलो तय है, लेकिन जमीन पर इसकी उपलब्धता लगभग शून्य है, जिससे किसान ‘ब्लैक’ में खाद खरीदने को मजबूर हैं। वहीं, DAP का दाम ₹1,200 से बढ़कर ₹1,350 प्रति बैग हो गया है और NPK के बढ़ते प्रयोग ने प्रति एकड़ लागत को और अधिक बढ़ा दिया है।
भंडारण और नीतिगत असमानता पर सवाल
पार्टी प्रवक्ता नासिर सलीम ने भंडारण व्यवस्था की खामियों को उजागर करते हुए कहा कि कोल्ड-स्टोरेज की ‘मनमानी’ दरें किसानों की कमर तोड़ रही हैं। उन्होंने नीतिगत भेदभाव का मुद्दा उठाते हुए कहा कि अनाज के विपरीत, आलू के लिए सरकार के पास कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) या कीमतों में गिरावट के समय सुरक्षा देने वाला कोई ‘बफर स्टॉक’ तंत्र नहीं है।
समाजवादी पार्टी का स्पष्ट रुख है कि जब तक कोल्ड-स्टोरेज के आर्थिक पहलुओं में सुधार नहीं होता और कीमतों के जोखिम को साझा करने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं बनती, तब तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान इस दलदल से बाहर नहीं निकल पाएगा।

