आगरा। जिला पंचायत आगरा के वर्तमान कार्यकाल की अंतिम बोर्ड बैठक सोमवार को ‘चम्बल टाइम्स’ की खबरों के साये में संपन्न हुई। हमारी रिपोर्ट का असर यह रहा कि पाँच साल तक बेखौफ घूमने वाले ‘डमी’ सदस्यों में दिनभर खलबली मची रही। हालांकि, प्रशासन की सख्ती और मीडिया के कैमरों के बावजूद कुछ ‘माननीयों’ के प्रतिनिधियों ने नियमों को ठेंगा दिखाते हुए सदन के भीतर अपनी मौजूदगी दर्ज करा ही ली।

गेट पर दिखी सख्ती, पहली बार सदन पहुंचीं महिला सदस्य
12 जनवरी 2026 की यह बैठक आगरा की राजनीति में एक बड़े बदलाव की गवाह बनी। ‘चम्बल टाइम्स’ द्वारा उठाए गए तीखे सवालों के बाद पुलिस और प्रशासनिक अमला गेट पर सक्रिय नजर आया। इसका सुखद परिणाम यह रहा कि जो महिला सदस्य पिछले 5 साल से सदन का रास्ता नहीं जानती थीं, उन्हें आज खुद अपनी सीट पर बैठना पड़ा। वहीं, खुद को ‘असली सदस्य’ समझने वाले कई डमी प्रतिनिधि आज गेट के बाहर ही खड़े नजर आए।

जिम्मेदारों की मौजूदगी में भी ‘चोर दरवाजे’ से एंट्री?
सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि जब सदन में जिला पंचायत अध्यक्ष मंजू भदौरिया, सीडीओ प्रतिभा सिंह और एएमए उमेश चंद्र जैसे आला अधिकारी मौजूद थे, तो कुछ गैर-निर्वाचित ‘रसूखदार’ चेहरे मेजों पर कैसे काबिज हो गए? यह नजारा साफ करता है कि जिला पंचायत में ‘प्रतिनिधि कल्चर’ का कैंसर कितना गहरा है, जिसे उखाड़ने में प्रशासनिक मशीनरी भी लाचार दिखी।
विदाई बैठक की गरिमा पर फिर उठा सवाल
बैठक में अंतिम बजट और विकास कार्यों के प्रस्ताव पास हुए, अध्यक्ष ने सभी का आभार भी जताया। लेकिन चर्चा का केंद्र विकास कम और ‘डमी बनाम असली सदस्य’ ज्यादा रहा। सदस्यों ने क्षेत्र की समस्याएं उठाईं, लेकिन सदन में अनाधिकृत लोगों की मौजूदगी ने लोकतांत्रिक व्यवस्था की शुचिता पर फिर से प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया।

चम्बल टाइम्स का नजरिया: अभी लड़ाई अधूरी है
यह बैठक 5 साल के सफर का समापन थी, लेकिन यह ‘डमी राज’ की विदाई नहीं बन पाई। चम्बल टाइम्स ने प्रशासन को आईना दिखाया, जिसका असर तो हुआ पर पूर्ण समाधान नहीं मिला। अब 2026 के चुनावों में फैसला जनता के हाथ में होगा— क्या वे ऐसे ‘डमी’ प्रतिनिधियों को फिर मौका देंगे या असली नेतृत्व को चुनेंगे?

