आगरा। ताजनगरी की ग्रामीण सत्ता का सबसे बड़ा केंद्र ‘जिला पंचायत आगरा’ कल अपनी वर्तमान पारी की आखिरी पारी खेलने जा रहा है। 12 जनवरी 2026 को होने वाली यह बोर्ड बैठक इस कार्यकाल की अंतिम अधिकारिक बैठक है। लेकिन इस बैठक के साथ ही एक बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है— क्या इस विदाई बैठक में आगरा की जनता के असली प्रतिनिधि नजर आएंगे, या फिर पिछले 5 सालों की तरह ‘प्रतिनिधि’ और ‘डमी’ सदस्य ही अधिकारियों की नाक के नीचे लोकतंत्र का मजाक उड़ाएंगे?
5 साल का काला इतिहास: ‘प्रतिनिधि प्रथा’ का बोलबाला
जिला पंचायत आगरा के गलियारों में यह चर्चा किसी से छिपी नहीं है कि पिछले 5 वर्षों में कई निर्वाचित सदस्यों ने सदन की दहलीज तक नहीं लांघी। उनकी जगह सीटों पर उनके पति, भाई या रसूखदार गुर्गे बैठते आ रहे हैं। नियमानुसार, बोर्ड बैठक में केवल वही व्यक्ति बैठ सकता है जो निर्वाचित है और जिसने पद की शपथ ली है। मगर आगरा में यह नियम कागजों तक ही सीमित रहा।

अधिकारियों की मौजूदगी में नियम तार-तार
बोर्ड बैठक में जिला पंचायत अध्यक्ष, अपर मुख्य अधिकारी (AMA) और जिले के तमाम विभागों के Class-A अधिकारी मौजूद रहते हैं। यह गंभीर विषय है कि इतने बड़े अधिकारियों की मौजूदगी में कोई बाहरी व्यक्ति ‘सदस्य’ की हैसियत से कैसे बैठ सकता है? 12 तारीख की इस अंतिम बैठक में जनता की नजरें प्रशासन पर टिकी हैं कि क्या वे इस ‘अवैध घुसपैठ’ को रोक पाएंगे।

विदाई बैठक: जिम्मेदारी की या महज खानापूर्ति की?
कल की बैठक में करोड़ों के विकास कार्यों और कार्यकाल के समापन के प्रस्तावों पर मुहर लगनी है।
- सवाल यह है: क्या इन प्रस्तावों पर हस्ताक्षर उन सदस्यों के होंगे जो घर बैठे हैं?
- सवाल यह भी है: क्या उन ‘डमी’ चेहरों को सदन से बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा जो 5 साल से जनता की आवाज को दबाकर अपनी राजनीति चमका रहे हैं?
चम्बल टाइम्स की विशेष रिपोर्ट: अब जनता हिसाब मांगेगी
जनता ने वोट विकास के लिए दिया था, न कि किसी के ‘प्रतिनिधि’ को सदन में बिठाने के लिए। कार्यकाल समाप्त हो रहा है, और अब 2026 के चुनावों की आहट है। ऐसे में यह आखिरी बैठक यह तय करेगी कि वर्तमान बोर्ड ने अपनी गरिमा रखी या ‘डमी कल्चर’ को बढ़ावा देकर विदा हुए।

